पांच साल से रिलेशनशिप में , लेकिन नहीं बंध सकते शादी के बंधन में , क्योंकि कानून में प्रावधान नहीं

राजस्थान


जयपुर
देश में भले ही ट्रांसजेंडर्स को चुनाव लड़ने से लेकर अन्य कई अधिकार दिए जा रहे हो, लेकिन अभी भी बहुत से ऐसे अधिकार है, जिससे फिलहाल वे वंचित है। जयपुर की 25 वर्षीय ट्रांसजेंडर मालिनी दास पिछले पांच साल से अंकित कुमावत के साथ रिलेशनशिप में हैं। सभी बाधाओं के खिलाफ दोनों ने अपने रिश्ते को स्वीकार करने के लिए अपने परिवार को तो समझा लिया है, लेकिन पति और पत्नी के रूप में रहने का कोई अधिकार अभी भी कानूनी रूप से उनके पास नहीं है।


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कानून में नहीं है कोइ प्रावधान
उल्लेखनीय है कि भारत में कानून के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है ,जिसमें एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति शादी कर सकता हो। न तो पर्सनल मैरिज एक्ट्स और न ही स्पेशल मैरिज एक्ट में , ट्रांसजेंडर्स का इस संबंध में कोई जिक्र नहीं है। कानूनी विड़बनाओं के चलते उनके लिए अपने रिश्ते को सार्वजनिक करना मुश्किल हो जाता है।

राज्य में हजारों ऐसे ट्रांसजेंडर
मालिनी का कहना है कि हमारे अलावा राज्य में ऐसे हजारों ट्रांसजेंडर हैं , जिन्हें भी जीवनसाथी के रूप में कानूनी वैवाहिक अधिकार नहीं हैं। जब तक वैवाहिक अधिकार नहीं मिलता, तब तक हमारे लिए कोई सुरक्षा नहीं होगी। इसी तरह ट्रांसजेंडर सुनीता (बदला हुआ नाम ) ने कहना कि वैवाहिक अधिकारों मिलने से जहां हमे सम्मानजनक नागरिक के रूप में जीने की आजादी मिलेगी, वहीं आगे बढ़ने का यह एक और कदम होगा। लेकिन अफसोस अभी तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

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लंबे समय से ट्रांसजेडर कर रहे हैं इसे लेकर संघर्ष
नई भोर संगठन की प्रमुख पुष्पा माई ने कहना है कि मैं इस बात से सहमत हूं कि एक ट्रांसजेंडर एक धार्मिक समारोह में अपने साथी से शादी कर सकता है, लेकिन अगर पार्टनर दस साल बाद उसे छोड़ देता है, तो ऐसा कोई कानूनी अधिकार हैं?, जिससे वो सुरक्षित महसूस कर सके। हम अपने अधिकारों के लिए कानूनी समर्थन चाहते हैं जो हमें हमारे भविष्य को सुरक्षित करने में मदद कर सके। इस विषय को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट के वकील मितुल जैन का कहना है कि यह समुदाय की लंबे समय से इस संबंध में मांग चली आ रही है । उन्होंने बताया कि 2019 में ट्रांसजेंडर पर्सन्स प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट लागू किया गया, लेकिन जिसमें समुदाय की संपत्ति या वैवाहिक अधिकारों का कोई उल्लेख नहीं था। इन लोगों के उत्थान के लिए जल्द से जल्द कानून को लागू करने की आवश्यकता है।

राजस्थान में ट्रांसजेंडर नहीं उठा पा रहे सरकारी योजनाओं का लाभ
इधर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सात साल होने के बाद भी ट्रांसजेंडर्स अपने पहचान पत्र मिलने की इंतजार कर रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2016 में, 16,517 ट्रांसजेंडर्स को मतदान सूची चिन्हित किया गया था, लेकिन अब तक इनमें से केवल 375 में मतदाता पहचान पत्र बनाए जा चुके थे। राजस्थान की बात करें, तो लगभग यहां एक लाख ट्रांसजेंडर निवास करते हैं। लेकिन पहचान पत्र ना होने की वजह से ट्रांसजेंडर राज्य सरकार की सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। नई भोर एनजीओ की पुष्पा माई का कहना है कि शीर्ष अदालत का फैसला आने के बाद भी समाज कल्याण विभाग का इस मामले में ढुलमुल रवैया है।



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